पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान – विकास और सामरिक संभावनाएं

 

IAF-P      Gloster Meteor

गणतंत्र दिवस का दिन .. राजपथ पर होने वाला वाला समारोह समाप्ति की कगार पर है , और सबको बेसब्री से इंतज़ार है, अंबाला और कानपुर वायुसेना अड्डों से आते वायुयानों,  माफ़ कीजिये ! लड़ाकू विमानों के , दांतों तले ऊंगली दबाने को मजबूर करने वाले, हवाई करतबों का | और ये देखिये ! वायुसेना के सर्वोत्तम लड़ाकू विमानों में से एक , ‘संपूर्ण-उच्चतर वायु प्रभुत्व ‘ वाला , सुखोई -30 एमकेआई ‘वर्टीकल चार्ली’ …आसमान में सीधा ऊपर जाकर अपनी धुरी पर तीन बार पलटने की क्रिया  करता हुआ आंखों से ओझल हो गया !.. हर तरफ रोमांच और गर्व !

कभी सोचा है , इतनी भारी मशीनें कैसे बारीकी और कुशलता से इस तरह उड़ सकती हैं ? सोचिये …शायद कोई जवाब नहीं सूझा आपको ! चलिए हम ही उठा देते हैं , लड़ाकू विमानों के इस रहस्य से पर्दा !

Enola Gay B29     Bockscar

6 अगस्त ’1945.. जापान के शहर हिरोशिमा पर अमेरिकी बी-29 इनोला गे विमान से ‘लिटिल ब्याय’ और 9 अगस्त ’1945.. जापान के ही एक और शहर  नागासाकी पर बॉकस्कार विमान से ‘फैटमैंन’ नाम के दो परमाणु बम गिराए गए जो की द्वितिय विश्व का अंत था , पर शुरुआत थी एक नयी होड़ की ; होड़ विध्वंशक हथियारों और उन्नत किस्म के लड़ाकू विमानों की | पहला ज्ञात लड़ाकू विमान था एमइ-262 जो की द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तत्कालीन नाज़ी जर्मनी द्वारा इस्तेमाल किया गया | तब से लेकर आज तक इन विध्वंशक  मशीनों की क्षमताओं और डिज़ाइन में उल्लेखनीय विकास हुआ है ; और आज  हम पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित कर रहे हैं | वर्तमान में हमारे पास स्टेट-ऑफ़-द-आर्ट (दर्शनीय तकनीकियों तथा वयुगातिकीय क्षमता वाले परिष्कृत ) विमान मौजूद हैं , जो की तथाकथित चौथी पीढ़ी के हैं | यहाँ मैं ये स्पष्ट करना जरूरी समझता हूँ की ये सिर्फ तुलनात्मक वर्गीकरण है न की कोई ठोस परिभाषा |

 

प्रथम विश्व युद्ध के बाज

28 जून 1914.. आस्ट्रिया- हंगरी  साम्राज्य के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक  फ्रेंज फर्डिनेंड  की एक युगोस्लोवाकिय नागरिक द्वारा हत्या ,केन्द्रीय शक्ति राष्ट्रों में फैले स्वपोषित राजनीतिक तथा आर्थिक असंतोष और इसी क्रम में , 28 जुलाई 1914 को आस्ट्रिया- हंगरी साम्राज्य द्वारा सर्बिया पर चढ़ाई के परिणाम स्वरुप केंद्रीय और मित्र राष्ट्रों और इनके उपनिवेशों के मध्य फैले युद्ध ने एक भयानक रूप ले लिया। और देखते ही देखते विश्व की बड़ी ताकतें इसमें शामिल हो गई। इस पहले वैश्विक युद्ध, जिसे प्रथम विश्व युद्ध के नाम से जाना जाता है, में भी लड़ाकू विमानों का जम कर इस्तेमाल हुआ और इन्हें इस्तेमाल करने वाले अग्रणी राष्ट्र रहे अमेरिका , ब्रिटेन  व जर्मनी ।

शुरुआती विमान लकड़ी से बनाये गए जिसे कपड़े से ढका जाता था। .अधिकतम 100 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से उड़ने वाले ये नन्हें बाज़ हमला करने और और टोह लेने में ज़मीनी सेना की मदद करते थे , जो की इनका प्राथमिक उद्देश्य था। लेकिन जल्द ही ये साफ़ हो गया कि हवा में प्रभुत्व ही ज़मीनी सेना की जीत के प्रमुख कारणों में से एक है । और इन नन्हे पंछियों का और बेहतर इस्तेमाल बदल सकता है युद्ध का  निर्णय।पिस्टन इंजनों से संचालित प्रोपेलर युक्त ये विमान हथियारों के तौर पर छोटी तोपों और मशीनगनों का इस्तेमाल करते थे। . देखने में साधारण बाई प्लेन से दीखते इन विमानों में सिर्फ सीट होती थी और काकपिट खुला था। कुछ प्रमुख विमान रहे मुस्तांग P-51…

Mustang P 51

पीढ़ी दर पीढ़ी : द्वितीय विश्व युद्ध से वियतनाम वार तक

आपको जानकर कर आश्चर्य होगा कि उपरोक्त विमानों को पहले विश्व युद्ध में इस्तेमाल के बावजूद पहली पीढ़ी के युद्धक विमान नहीं माना जाता ! लेख के आरम्भ में उल्लखित जर्मन मी -262 पहला जेट विमान था जो कि इस श्रेणी का पहला विमान माना जाता है ;ये जर्मनी द्वारा 1939 में निर्मित पहले ऑपरेशनल टर्बोजेट ही -178 के परिष्कृत संस्करण ही-280 पर आधारित था। अपने स्वेप्ट विंग्ड डिज़ाइन के चलते इसे उच्च गति पर कम  वायु  गतिरोध का सामना करना पड़ता था, जिससे ये अपने उद्देश्यों में काफी हद तक कामयाब रहा। इसके समकालीन कुछ और विमान थे रॉयल एयर फ़ोर्स का ग्लोस्टर मिटीयोर और F-86.

ME 262     F- 86 Sabre

कई उपलब्धियों के बावजूद प्राथमिक  जेट फाइटर परफेक्शन से कोसों दूर थे और जल्द ही नकार दिए गए।  कम परिचालन आयु , धीमी रफ़्तार और पिस्टन इंजन से  भी कमतर संवेग क्षमता इसकी बड़ी वजह बने। जल्द ही रोल्स रायस  नेने इंजनो की मदद से सोवियत कंपनी माइकोयान – Gruevich  ने कोरियन युद्ध ( 25 जून ’1950-27 जुलाई 1953) के दौरान मिग -15 का निर्माण किया जो कि इस युद्ध में उत्तरी कोरिया द्वारा इस्तेमाल किया गया। पूर्णतया स्वेप्ट विंग्ड और ध्वनि की रफ्तार से बस जरा ही चूकने वाले इन विमानों ने इस युद्ध में दक्षिण कोरिया का साथ दे रहे अमेरिकी एफ -80 पायलेटों को परेशान कर दिया।  दिलचस्प है कि  इन दोनों की पहली  भिडंत (8 Nov 1950) में एक एफ -80 ने दो मिग -15 मार गिराए। ! पर यही युद्ध का अंत नहीं था ..अमेरिका ने इसके तुरंत बाद एफ -86  सैबर विमान  मैदान में उतार कर युद्ध में दोनों पक्षों के समीकरण बराबर कर दिए। जहां मिग15 अपनी सर्विस सिलिंग- अधिकतम उड़ान ऊंचाई (50,000 फीट) और तेज गति की ऊंचाई प्राप्त करने कीक्षमता के बल पर इतराते थे। वहीं एफ 86 की मुड़ने और गोता खाने की दक्षता मिग से कहीं बेहतर थी। तुलनात्क रुप से बेहतर सामरिक प्रदर्शन  के बलबूते सैबर युद्ध को अमेरिकी- दक्षिण कोरियाई पक्ष में मोड़ने में सफल रहे, और साथ ही स्थापित कर गए युद्धक विमानों के नए मानक और तय कर गए उनके उज्जवल भविष्य…..

MiG 15     MiG 21

1950वे दशक के मध्य में द्वितीय विश्व युद्ध और कोरियन वार से सबक लेते हुए तथा तीसरे विश्व युद्ध (पढ़ें परमाणु युद्ध) की आशंका के मद्देनजर लड़ाकू विमानों के दो प्रमुख डिजाइन विकसित हुए। पहला इंटरसेप्टर, जैसे मिग 21, जो कि भारी मात्रा में हथियार ले जा सकते थे। और अधिक शक्तिशाली राडार से युक्त थे। इनकी सर्विस सिलिंग और ऊंचाई प्राप्त करने की दर बहुत अधिक थी ताकि ये दुश्मन विमानों को हवा में ही घेर सकें। और मिसाइल हमलों को काट सकें, जबकि दूसरा फाइटर बांम्बर्स  जैसे सुखोई-7बी , जो कि जरूरत  के मुताबिक वायु युद्ध और ज़मीनी हमले के काम आते थे।बात करें मिग 21 ( पहली फ्लाइट 14 फऱवरी 1955) की तो डेलेटा विंग सुपिरियर एयरफ्रेम और माक 2.0 तक की सुपर सोनिक रफ्तार की वजह से जल्द हा सबके पसंदीदा बन गए। इसके बाद इसके परिष्कृत संस्करण मिग 21 Fagot(1959) और मिग 21 Bison(1985 ) ( जो चौथी पीढ़ी का विमान था) आए। इन्हे इतिहास के अबतक के सबसे अधिक  उत्पादित (कुल 11,496) लड़ाकू विमान होने का गौरव प्राप्त है।  गौरतलब है कि चार महाद्वीपों के पचास देशों की वायुसेनाओं द्वारा उड़ाए गए ये विमान अभी भी भारतीय वायुसेना की सेवा में हैं।

विकास की तेज रफ्तार के चलते 1960वें दशक के पूर्वार्ध में तीसरी पीढ़ी के लडाकू विमानों- मिग 23, शेंयांग जे 8 डी, जगुआर, ए-6 इंट्रूडर, एल टी वी ए 7 कोरसेयर2, आदि का आगमन हुआ।  एनालाग वैमानिक प्रणालियों , इन्फ्रारेड फील्ड व्यू सेंसर्स, एडवांस्ड कामबेट मैकेनिज्म, माक 1.3 से ज्यादा की रफ्तार और थ्रस्ट  वेक्टरिंग तकनीक की मदद से ये विमान दिन रात के जमीनी हमलों और एयर डिफेंस में  मील का पत्थर साबित हुए।  सेपेकैट जगुआर आज भी भारतीय वायुसेना के डीप स्ट्राइकर फाइटर्स-की गहराई तक मार करने वाले लड़ाकू विमानों की भूमिका निभा रहे हैं।…..

नए कीर्तिमान – चौथी पीढ़ी व उससे आगे

कर्नल जान बायड और गणितज्ञ थामस क्रिस्टी  के द्वारा दिए गए ऊर्जा- वायुगतिकीय सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए चौथी पीढ़ी के विमानों में काफी बदलाव हुए, 1970 के दशक के शुरुआती सालों से लेकर 1990 के दशके के बीच विकसित विमानों को चौथी पीढ़ी का माना जाता है। जो सामरिक दक्षता में अपने पूर्वजों से कोसों आगे और  सिर्फ गति  पर निर्भर ना रहकर – स्पीड, ऊंचाई और दिशा तीनों के प्रभावी सामंजस्य का प्रयोग करते हैं।

रिलैक्सड स्टेटिक स्टेबिलिटी आरएसएस –  हवा में तनाव रहित स्थाई स्थिरता को पूर्णतया डिजिटल फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम के जरिए मुमकिन किया गया है। और ये सुसज्जित हैं पूर्ण अधिकृत डिजिटल इंजन कंट्रोल (पहली बार प्रैट  एंड व्हिटनिंग एफ100 टर्बोफैन में इस्तेमाल)  फायर कंट्रोल रडार,  हेडअप डिस्प्ले- पायलट को सारी जानकारी मुहैया कराने वाली पारदर्शी स्क्रीन , हैंडस आन थ्रोटल एंड   स्टिक  कंट्रोल- सभी महत्वपूर्ण कंट्रोल्स कंट्रोल- स्टिक पर तथा बहुआयामी स्क्रीन  से जो कि युद्ध क्षेत्र तथा विमान की स्थिति का सटीक विवरण देती है। कुछ खास चौथी जनरेशन के फाइटर्स हैं- सुखोई27 फलैंकर, एफ 16, मिग 29, डसाल्ट मिराज 2000 आदि। ये बहुउपयोगी युद्धक विमान हैं।

MiG 29     Dassault Mirage 2000

गत कई दशकों के लम्बे समय से निरंतर विकास की प्रक्रिया से गुजरते रहे ये विमान, अब पहले से कही घातक और युद्ध के त्रुटिहीन साधनों में गिने जाते हैं | सुपीरियर एयर डोमिनांस (श्रेष्ठ हवाई प्रभुत्व ) उच्चतर सामरिक क्षमताओं और बेहतरीन मेन्यूवरएबिलिटी-संचालन में निपुणता और गतिशीलता से युक्त ये फाइटर प्लेनस आवाज़ की गति से कई गुना तेज़ रफ़्तार से उड़ते हैं !! हालांकि वर्तमान में इस्तेमाल हो रहे अधिकांश विमान अब रिटायरमेंट की कगार पर हैं, और इनको बदलने के लिए तैयार हैं – हाल के कुछ वर्षों से विकसित किये जा रहे , 4.5वें जनरेशन के फाइटर्स | सरल शब्दों में कहा जाए तो 4.5वें जनरेशन के लड़ाकू विमान चौथी जनरेशन के वो विमान हैं, जिन्हें उन्नयित किया गया है- नई बेहतर वैमानिकी प्रणालियों, उच्च क्षमता डाटा-लिंक, एईएसए- एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड अर्रे एलआईपीआर  (लो इंटरसेप्ट प्रोबबिलिटी रडार) रडार और अधिक सटीक शस्त्र प्रणालियों से | यहाँ वैमानिक प्रणालियों से आशय है विमान पर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम , संचार और नेविगेशन (मार्गदर्शक) प्रणालियां , रडार और इंफ्रा रेड सेंसर , कंप्यूटर , डाटा-बस और उपयोगकर्ता इंटरफेस (संचालन सुगमता प्रणाली) आदि | 1985 से 1995 के मध्य माइक्रो  चिप और सेमीकंडक्टरों के क्षेत्र में आए  क्रांतिकारी परिवर्तन की बदौलत मुमकिन हुए इस बदलाव के आधार पर निर्मित विमानों ने वायु-युद्ध (व्यापक व सीमित संघर्ष) की परिभाषा बदल कर रख दी है। वर्तमान में उपलब्ध 4.5 जनरेशन के कुछ विमान हैं- अमेरिकी कंपनी बोइगं का एफ/ए-18ई/एफ सुपर हार्नेट, यूरोपियन देशों का संयुक्त प्रक्रम  – यूरो फाइटर टायफून, हि. ए. लि. का तेजस (भारतीय वायुसेना द्वारा परीक्षारत), चीनी चेंग दु – जे10 और जे10 बी, फ़्रांसिसी  डसाल्ट राफेल, स्वीडिश  ग्रिपन , भारतीय वायुसेना का सुखोई30 एमकेआई, सुखोई 30 एमकेके माइकोयान  का मिग 29 एम, मिग 29 के और मिग 35 आदि।

HAL Tejas     MiG 35

पांचवीं पीढ़ी

पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ के युद्धक विमान भविष्य के विमान हैं इनमें पहला स्थान अमेरिकी एफ-22 रैप्टर का आता है।15 दिसम्बर 2005 से  यूएस एयर फोर्स के द्वारा नियमित इस्तेमाल में रहा ये विमान विश्व  का एकमात्र फ्फिथ जनरेशन फाइटर है ।

हालांकि वैश्विक मंदी के चलते अधिक लागत (65 बिलियन डालर प्रोजेक्ट ) के कारण हाल ही में आखिरी 195वां विमान अमेरिकी वायुसेना के सुपूर्द करके इनका उत्पादन बंद कर दिया गया है।

इन विमानों की सबसे बड़ी खसियत इनका स्टेल्थ होना है- अर्थात सभी प्रकार  के टोही यंत्रों  (रडार, इन्फ्रारेड  सेंसर्स आदि) के लिए तकनीकी रुप से अदृश्य। …वजह ? वजह जानने से पहले आइये समझते हैं कि रडार किस तरह काम करता है। रडार एक खास तरह के उच्च फ्रीक्वेन्सी विकिरण चारों तरफ फैलाता रहता है। इसकी रेंज में आने वाली किसी भी वस्तु से टकराकर सिग्नल वापस रडार की तरफ मुड़ जाते हैं जिन्हें पाकर रडार वस्तु की दूरी, दिशा, रफ्तार तथा आकार की गणना करके  इसकी स्क्रीन  पर दर्शाता है। पांचवी पीढ़ी फाइटर्स के एयरफ्रेम  के डिजाइन इस तरह के हैं कि ये इन सिग्नल्स को रडार की तरफ वापस ना भेज के दूसरी दिशा में मोड़ देता है, और रडार उन्हें पकड़ नहीं पाता।

दूसरी बड़ी वजह है इनकी सतह पर रडार एब्जार्बमेंट मैटेरियल- विकिरण अवशोषी पदार्थ का लेप लगा होना जो कि, जैसा नाम से ही स्पष्ट है रडार विकिरणों को अवशोषित करने को काम आता है।

गौरतलब है कि रडार एब्जोर्बमेंट मेटेरियल का पहली बार युद्धक विमानों के लिए इस्तेमाल जर्मनी द्वारा द्वितिय विश्व युद्ध के दौरान होरटन हो 229 विमानों पर किया गया सन 1983 में  लॉक  हीड ने 117 नाइट हाक विमानों पर इसका इस्तेमाल किया। वहीं 1989 में नार्थ रॉप  ग्रुमन  ने बी 2 स्पिरिट बम्बर्स के लिए और नतीजे शानदार रहे। इस मेटेरियल के तौर पर आयरन बाल पेंट, निओप्रिन पोलिमर के साथ आटरन बाल फिलिंग्स या आयरन बाल पेंट के साथ गैर चुंबकीय पदार्थों के मिश्रण का प्रयोग किया जाता है।

बता दें कि ये मेटेरियल विमान को पूरी तरह अदृश्य नही बनाते वरन अलग अलग मेटेरियल भिन्न भिन्न फ्रीक्वेंसी  के रडार विकिरणों को अवशोषित करते हैं, इस तरह ये विमान को कुछ हद तक रडार की नजरों से बचा पाते हैं। जबकि खराब मौसम भी इसकी क्षमता को प्रभावित  कर सकता है।

F 22 Raptor     F-A-18-E-F Super HornetJ 20 KAI-KF_X

पांचवी पीढ़ी के वायुयान एक महत्तवकांक्षी परियोजना हैं , विभिन्न राष्ट्रों द्वारा विकसित की जा रही तकनीकें अपने विकास के अंतिम चरण में पहुँचने वाली हैं। हालांकि विशेषज्ञों की राय में पांचवी पीढ़ी के विमानों की जो वांछित योग्यताएं हैं, उन्हें एक साथ प्राप्त करना एयरोडायनमिक्स और एयरफ्रेम डिजाइनरों के लिए एक बड़ी चुनौती है । उदाहरण के तौर पर फिफ्थ जनरेशन फाइटर्स की दो प्रमुख विशेषताओं – स्टील्थ तकनीक और उच्चतम –संचालन सुगमता (सुपरमेन्यूवरिवेलिटी) को अमेरिकी कंपनी लॉकहीड-मार्टिन ने एफ-22 रैप्टर में शामिल करने की कोशिश की। लेकिन इसे पूर्णतया स्टील्थ बनाने के लिए उन्हें इसकी संचालन -सुगमता के साथ समझौता करना पड़ा। इसी तरह रूस द्वारा विकसित किया जा रहा पीएके-एफए (टी-50) विमान अपनी 16 परिक्षण उड़ानों के बाद भी स्टील्थ तकनीक को लेकर सवालों के घेरे में है। विश्व के अनेक देशों में चल रही कुछ प्रमुख परियोजनाएं हैं – सुखोई /एचएएल (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ) का एफजीएफए  (पहली टेस्ट फ्लाइट -29 जनवरी’2010), रूसी कंपनी माइकोयान -ग्रूएविच का 2 एमएफएस-मिग 1.27, एचएएल का ही एडवांस्ड मीडियम कॉमबेट एयरक्राफ्ट (एएमसीए)–एक ट्विन इंजन पांचवी जनरेशन फाइटर जो की भारतीय वायुसेना के जगुआर और डसॉल्ट मिराज़-2000 की जगह लेगा। अमेरिकी कंपनी बोईंग का एफ-35 लाइटनिंग-II, साउथ कोरियन-केएआई-केएफ-एक्स,चाइनीज ब्लैक ईगल  जे-20 और जे-एक्स एक्स, और जापानी कंपनी मित्सुविशी का एटीडी-एक्स, ये सभी 2015 और उसके बाद के वर्षों में ऑपरेशनल होंगे। .

उल्लेखनीय है की सुपर – मेन्यूवरएबिलटी  प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल की जा रही तकनीक का नाम हैं – थ्रस्ट वेक्टरिंग- जिसमें विमान के पिछले हिस्से से निकल रही गर्म गैस का विभिन्न कोनों पर इस्तेमाल करके विमान को किसी भी दिशा में आसानी से मोड़ा तथा पलटा जा सकता है। जिसकी एक बानगी आप लेख के शुरुआत में पढ़ ही चुके हैं। यह तकनीक इन विमानों को वर्टीकल तथा शॉर्ट टेक –ऑफ और लैंडिंग की क्षमता भी प्रदान करती है जो की त्वरित और तीव्रगामी आपरेशनस के लिए अपरिहार्य है।

आइये , उम्मीद करें आने वाले कुछ वर्षों में हम सामरिक विधा और वायुगातिकीय तकनीक के ये मील के पत्थर भी हासिल कर लेंगे ।

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